मेरी ज़िन्दगी का खुलासा

सय्यद अली रज़ा नक़वी रज़ा अमरोही 18 रजोन सन 1939 को अमरोहा के क़दीम ख़ानदान ख़ुशमी में तवल्लुद हुए। इस ख़ानदान के मुरस-ए-आला ख़्वाजा ख़तीर सुल्तान ग़ियासुद्दीन बलबन के अहद में तुर्किस्तान के शहर बख़्शब से जो अब शहर क़रशी कहलाता है हिन्दुस्तान आए और बलबन से लेकर ग़ियासुद्दीन तुग़लक़ तक मुतवात्तर पाँच बादशाहों के वज़ीर रहे। तक़रीबन 25 साल ममलिकत के अहम ओहदों पर फ़ायज़ रहने के बाद मुस्तक़िल तौर पर अमरोहा तशरीफ़ लाए और मोहल्ला शख़्सी बसाया। उनके बाद भी इस ख़ानदान के अफ़राद शाह आलम आली ग़हर तक मुतवात्तर कई सौ साल अमरोहा के मुफ़्ती के ओहदे पर फ़ायज़ रहे। रज़ा अमरोही जब तक अमरोहा रहे जनाब जौन एलिया से तिलम्ज़ का शर्फ़ हासिल रहा। फिर सन 1963 में महक़मा डाक व तार में मुलाज़मत शुरू की। दिल्ली में जनाब शमीम करहानी से तिलम्ज़ हासिल करते रहे। सन 1963 में उनका पहला मजमुआ-ए-कलाम “परबत के पासबान” शाया हुआ, फिर सन 1967 में दूसरा मजमुआ “रंग ओ रोशनी” मंज़रे आम पर आया और सन 1982 में उर्दू अकादमी लखनऊ के तआवुन से “रक़्स नवासे” शाया हुआ। सन 1985 उर्दू अकादमी दिल्ली के तआवुन से “शहर ग़ज़ालां”, फिर सन 1987 में “फ़ख़रुद्दीन”, फिर सन 1987 में फ़ख़रुद्दीन अली अहमद मेमोरियल लखनऊ के तआवुन से “क़ंदील”। उसी साल हिंदी अकादमी दिल्ली के तआवुन से हिंदी में “सूरत तेरी दरपन मेरा” शाया हुई। सन 1983 में “ईमान व ऐक़ान”, सन 1984 “सफ़ीना-ए-नजात”, सन 2008 में “हर्फ़-ए-यक़ीं”, सन 2009 “गुलबांग”, सन 2012 में “सर चश्मा-ए-इन्क़लाब” छपी। क़ौमी शायरी पर उन्हें सद्र-ए-जमहूरिया-ए-हिंद ऐवार्ड और उर्दू अकादमी दिल्ली व लखनऊ से ऐवार्ड मिले। सन 1963 में जवाहर लाल नेहरू ने उनकी क़ौमी नज़्मों का 16 ज़बानों में तर्जुमा कराया। उनकी नज़्में गुलशन-ए-उर्दू अलीगढ़ के निसाब में शामिल हैं। हिन्दुस्तान के भी रेडियो और टीवी चैनल उन्हें नशर करते रहते हैं। सन 2009 में हज किया। ईरान का दौरा भी किया। इसके अलावा उन्हें बहुत सी अदबी अंजुमनों और संस्ताओं ने इनआमात दिए हैं। 11 साल की उमर से शेर कह रहे हैं। पहली बार जो मुतरन्नुम अल्फ़ाज़ उनके लब ओ दहन से निकल कर फ़ज़ा में गूँजे वो कुछ इस तरह थे।

क़िस्सा-ए-ग़म सुना रहा हूँ मैं
और ख़ुद मुस्कुरा रहा हूँ मैं

मुशायरों और महाफ़िल में मुस्तक़िल शिरकत करते हैं। जोश मलीहाबादी और जिगर मुरादाबादी से लेकर अब तक वो हर अज़ीम शायर के साथ मुशायरों, जलसों और महाफ़िल में पढ़ चुके हैं। उनका कलाम हिन्दुस्तान और बैरूनी हिन्दुस्तान के हर मयारी रिसाले में छप चुका है और छपता रहता है।